ऋषिवादी आरती — महर्षि कश्यप जी की
आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की, अदिति पति मरीचि नंदन की ॥
जाके तप से सृष्टि बन जावे, लोभ-दोष मन निकट न आवे ।
ऐसे श्रेष्ठ मुनि ऋषिवर जी की, आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की ॥
सत्य कर्म संग सत्ययुग लाए, सत्य घटे तो त्रेता कहलाए ।
एक कोने में पाप जो पाए, पाप देख सत्ययुग घबराए ॥
श्री राम को आप ही लाए, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ऋषिवर जी की,
आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की ॥
पाप कर्म जब रुक नहीं पाए, दो कोनों में पाप जो पाए ।
यही कल द्वापर कहलाए, श्री श्याम को आप ही लाए ॥
ऐसे श्रेष्ठ मुनि ऋषिवर जी की, आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की ॥
अब है घोर पाप का कलियुग, सत्य को ढूंढूं अब मैं निसदिन ।
सत्य नहीं अब आगे आता, एक कोने में खुद को पाता ।
कौन सुने मनुहार हमारी, जय जय जय ऋषिवाद तुम्हारी ॥
किसे पुकारें राम कहें अब, किसे पुकारें श्याम कहें अब ।
अब तुम ही हो एक सहारे, ऐसे श्रेष्ठ मुनि ऋषिवर जी की,
आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की ॥
महर्षि कश्यप जी की आरती जो जन गावे, मुनि प्रेम सहित गावे ।
कहत ब्रह्मज्ञानी, वही ऋषिवादी बन कर, सबकी नैया पार लगावे ॥
ऐसे श्रेष्ठ मुनि ऋषिवर जी की, आरती कीजिए महर्षि कश्यप जी की ॥
✍️ रचनाकार — अधिवक्ता नरेश कुमार कश्यप
(संस्थापक, ऋषिवादी विचारधारा)